by pusti | Aug 19, 2011 | E-zine
हरेर्दास्यं धर्मः उस रोज मंदिर में हुई सभा में एक भाई नें प्रश्न रखा था कि ‘ब्रह्म सम्बन्ध दीक्षा लिए बिना यदि कोई भगवत्सेवा करता हो तो क्या ऎसी सेवा भगवान् स्वीकार नहीं करेंगे ?’ मैंने उत्तर दिया था कि ‘आप सेवा करते हो’ इस पर उन्होंने पुनः प्रश्न पूछा कि ‘इसका मतलब...
by pusti | Jul 13, 2011 | E-zine
जो मोक्ष को भी एक झंझट मानकर केवल भक्ति ही निरंतर करते रहना चाहते हों उन्हें पुष्टिभक्त समझना चाहिए. अतएव वृत्रासुर कहता हैः न नाकपृष्ठं न च पारमेठयम् न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । न...
by pusti | May 31, 2011 | E-zine
Snan Yatra !! यह बात और है कि मुक्ति का स्वरूप प्रत्येक के मत में भिन्न भिन्न होता है. मुक्ति के स्वरूप के बारे में इतनी वैचारिक भिन्नता उन-उन विचारकों के मत में दुःख या बन्धन का स्वरूप क्या है इस पर निर्भर करती है. जीवात्मा की कैसी अवस्था को, किन विषयों को, किन...
by pusti | May 3, 2011 | E-zine
Nrusimha Chaudas !! धर्माचरण के द्वारा हम जीवन के किसी अलौकिक उदेश्य की सिद्धि चाहते हैं. इसी तरह अर्थोपाजन के द्वारा हम अपने काम पुरुषार्थ की सिद्धि चाहते हैं. कोई काम पुरुषार्थ की सिद्धि क्यों चाहता है? प्रश्न का उत्तर दे पाना कठिन कार्य है. क्योंकि अधिकाधिक इतना भर...
by pusti | Aug 30, 2010 | Photo Gallery
We all know that the only media for contacting our Param Pujya Acharyas during their absence in this world are books, paintings and Hastakshar (Handwriting). Out of these three the original ‘Hastakshars’ are the closest ones by darshan of which we reach...