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विकारः तत्प्रधाने स्याद्... ........  पूर्वमीमांसीयजैमिनीसूत्र (9।1।41 )  

विकाराद्यात्मना च परिणामो... ........  ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य (1।4।26 )  

विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः... ........  भागवतपुराण (10।30।40 )  

विजातीयद्वैत...शुद्धाद्वयसिद्धिः... ........  ब्रह्मसूत्राणुभाष्यप्रकाश (2।1।13 )  

विज्ञातारम् अरे केन विजानीयाद्... ........  बृहदारण्यकोपनिषद् (2।4।14 )  

विट्ठले च श्रीरंगे वेंकटे तथा ........  तत्त्वार्थदीपनिबन्ध (2।255 )  

वित्तं दत्वा अन्येन पुरुषेण कृत्वा... ........  सिद्धान्तमुक्तावलीविवरण (2 )  

विदुरकाष्ठाय मुहुःकुयोगिनाम् ........  भागवतपुराण (2।4।14 )  

विदुषः कर्मसिद्धिः स्यात्... ........  भागवतपुराण (10।24।6 )  

विद्यया करोति ........  छान्दोग्योपनिषद् (1।1।10 )  

विद्याविनयसम्पन्ने ........  भगवद्गीता (5।18 )  

विधिमुखेन प्रमाणस्य विषयः...तत्र असम्भवाद्... ........  भगवद्गीतामधुसूदनी (13।12 )  

विना पशुघ्नाद् ... ........  भागवतपुराण (10।1।4 )  

विना श्रीवैष्णवीं दीक्षां... ........  पद्मपुराण (। । )  

विनापि चं समुच्चयो भवति... ........  पातञ्जलमहाभाष्य (। । )  

विनोदाय चैतन्यम्...शिवं वा करोषि... ........  देवीभुजञ्गप्रयातस्तोत्र (4 )  

विप्रं कृतागसमपि... ........  भागवतपुराण (10।65।41-42 )  

विप्राणां नैव धार्यं स्यात्... ........  पद्मपुराणोत्तरखण्ड (225।18-20 )  

विप्रो अधीत्य आप्नुयात् प्रज्ञां... ........  भागवतपुराण (12।12।64 )  

विभावेन आहृतो यो अर्थस्तु... ........  भरतनाट्यशास्त्र (7।1-2 )  

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