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माम् एकं शरणं व्रज... ........  भगवद्गीता (18।66 )  

माययाहि अन्यदिव... ........  नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् (9 )  

माया च अविद्या च स्वयमेव... ........  नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् (9।3 )  

मायान्तु प्रकृतिं विद्याद्... ........  श्वेताश्वतरोपनिषद् (4।10 )  

मायामात्रन्तु कात्स्नर्येन अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात्... ........  ब्रह्मसूत्र (3।2।3 )  

मायामात्रम् इदं ज्ञात्वा... ........  भागवतपुराण (11।19।1 )  

मायामात्रम् इदं द्वैतम् ... ........  माण्डुक्योपनिषद्गौडपादकारिका (1।17 )  

मायावादम् असच्छास्त्रं... ........  पद्मपुराण (? )  

मायावादिनस्तु शुक्तिरूपाधिष्ठाने...इति वदन्ति... ........  प्रमेयरत्नार्णव (ख्यातिविवेक )  

मायावादो निराकृतः ........  पत्रावलम्बन (34 )  

मायी सृजते विश्वम् ...महेश्वरं... ........  श्वेताश्वतरोपनिषद् (4।9-10 )  

मार्गद्वयेन अनर्थनिवृत्ति: भक्तिमार्गेण ज्ञानमार्गेण च. ........  तत्त्वार्थदीपनिबन्ध प्रकाश (3।3।58 )  

माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु... ........  नारदपञ्चरात्र (। )  

माहात्म्यज्ञानस्य उपयोगम् आह... ........  तत्त्वार्थदीपनिबन्ध प्रकाश (1।42 )  

माहात्म्यज्ञापनायैव श्रवणं गुणकर्मणां ........  साधनदीपिका (9 )  

मिलितानाम् अन्वयः इतरेतरयोगः... ........  पाणिनिसूत्र (2।2।29 )  

मुक्तात्मनः प्रशंसावाक्यम् ... ........  सांख्यसूत्र (1।95 )  

मुखतो अवर्तत ब्रह्म... ........  भागवतपुराण (3।6।30 )  

मुखबाहूरुपज्जानां... ........  मनुस्मृति (10।45 )  

मुत् प्रीतिः प्रमदो हर्षः... ........  अमरकोश (1।7।263 )  

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